Shah Mastana Ji Maharaj

साई मस्ताना जी महाराज की शिक्षाएं

रूहानी फकीरों का अवतरण समस्त ब्रह्माण्ड के लिए आर्शीवाद होता है। इस नश्वर संसार से रूहों को आजाद करवाने और जीवन का असली उद्देश्य समझाने के लिए संत महात्मा हर युग में धरती पर मनुष्य के रूप में जन्म लेते हैं। जो अपने कर्मों और ज्ञान के द्वारा बुराइयों और अंधकार के जाल को काट कर अलौकिक प्रकाश फैलाते हैं।

सच्चे अध्यात्मिक गुरू की संगत से ही आध्यात्म के रास्ते पर चलकर आत्मिक खुशियों को हासिल किया जा सकता है और सच को समझा जा है।
पूजनीय संत बेपरवाह मस्ताना जी महाराज का अवतरण पूरी मानवता जाति के लिए वरदान साबित हुआ, जिन्होंने इस संसार रूपी जलते-सड़ते भट्ट में प्रेम और मानवता का बीज उगाया। उन्होंने अपनी शिक्षाओं के द्वारा सच का रास्ता दिखाया और लोगों का उद्धार किया। उन्होंने ‘डेरा सच्चा सौदा’ की स्थापना की, जो आज भी उनकी शिक्षाओं पर चलते हुए प्यार, सेवा और विश्वास जैसी कड़ियो के द्वारा सच के राह पर मार्गदर्शक बना हुआ है |

वैसे तो संतों का प्रत्येक कर्म ही संसार के लिए हितकर होता है, परन्तु उनकी कुछ शिक्षाएं, जिन्होंने समाज से कुरीतिओं और अंध-विश्वास को दूर कर जीने का सही तरीका सिखाया, इस प्रकार हैं-

सच्चा नाम – मुक्ति का आधार :

साई मस्ताना जी महाराज ने इस संसार को सच्चे नाम से परिचित करवाया, जिसे गुरुमंत्र, नामशब्द, कलमा या गॉडस वर्डस भी कहते हैं। उन्होंने समझाया कि सच्चे नाम-शब्द के निरंतर अभ्यास से ईश्वर की प्राप्ति की जा सकती है और इस संसार में रहते हुए भी स्वर्ग को पाया जा सकता है। धर्म के नाम पर समाज में फैले अंध-विश्वासों और कुरीतियों का खंडन कर मालिक तक पहुँचने की अलौकिक ताकत से अवगत करवाया, जो मनुष्य के अंदर पहले से ही विद्यमान है, उन्होंने लोगों की बुराइ‌याँ छुड़वा कर उन्हें सच से जोड़, उनके जीवन की दशा ही बदल दी। धर्मों का सही अर्थ और उपदेश समझा कर साईं जी ने जीवों को ईश्वर प्राप्ति का तरीका बताया, जिससे इस नश्वर संसार रूपी भवजल को पार किया जा सके।

निस्वार्थ प्रेम ही सर्वोपरि :

साई मस्ताना जी ने सिखाया कि प्रेम ही भक्ति का आधार है। उन्होंने समझाया जिस घट में प्रेम नहीं, वहाँ ईश्वर की प्राप्ति की आस व्यर्थ है। नफरत, ईर्ष्या और अहंकार की आग में जल रहे इस संसार में साई जी ने प्यार और भाईचारे का बीज बोया। उन्होंने समझाया कि सब एक मालिक के बच्चे हैं और हम सब में कोई भेद-भाव, उच्च नीच या जात पात का फर्क नहीं है। आपस में बेगर्ज़-निस्वार्थ प्रेम के द्वारा ही भगवान को पाया जा सकता है। किसी जीव के दिल को दुखाना ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ी रुकावट है। रिश्तों में वफादारी बरतते हुए सबसे निस्वार्थ प्रेम करना ही मालिक को खुश कर सकता है।इन्सानियत ही सबसे बडा धर्म:

‘हम सब एक हैं, हमारा मालिक एक है।’
साई जी ने सिखाया कि हमारे जीवन का उद्देश्य धर्मो के नाम पर लडना नहीं, बल्कि मालिक की बनाई सृष्टि की निस्वार्थ सेवा और परहित परमार्थ करना है। ईश्वर ने सिर्फ इन्सान को बनाया है। और इन्सानियत ही हमारा धर्म है। तन, मन, धन से असहाय और गरीब की मदद करना ही इन्सान का पहला फर्ज़ है। उनकी शिक्षाओं पर चलते हुए संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के मार्गदर्शन में ‘डेरा सच्चा सौदा’ अब 156 मानवता भलाई के कार्य कर रहा है। साईं जी ने समझाया कि मालिक की औलाद का भला ही मालिक की सेवा है और ईश्वर प्राप्ति का ज़रिया भी।

नशे छुड़वा शाकाहारी बनाया:

बेपरवाह मस्ताना जी महाराज ने लोगों को नशों से बचाया। उन्होंने ड्रग्स, तंबाकू और नशीले पदार्थों के सेवन से होने वाले मानसिक और शारीरिक नुकसान से लोगों को अवगत कराया और इन्हें छोड़ने का संदेश दिया | मांसाहार को त्याग शुद्ध शाकाहारी बनने के लिए लोगों को समझाया। उन्होंने लोगों को सुखी, स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीने के लिए सही रास्ता दिखाया, जिसका अनुसरण कर करोड़ों लोग अपनी जिंदगी से इन बुरी चीजों को दूर कर दूसरों के लिए भी मिसाल बन रहे हैं। साई जी ने समझाया नशे बर्बादी का घर हैं, जो इन्सान को कहीं का नहीं छोड़ते।बेजुबानों पर दया करना :

शाह मस्ताना जी महाराज हर किसी से प्रेम करने की शिक्षा देते, फिर चाहे वो कोई इन्सान हो, या आश्रम में अकसर निकल आने वाले कोबरा-बिच्छु। उनके अनुसार प्रत्येक जीव मालिक का अंश हैं, जिनको हमें मारना नहीं चाहिए। उन्होंने दया और प्रेम का पाठ सिखाया‌। बेजुबान पशु-पक्षियों और जानवरों की मदद करना, उन्हें चारा, चोगा देना और पानी पिलाना मनुष्य धर्म है। बेकसूर जानवरों को मार कर खाने से घोर पाप लगता है। साई जी ने सिखाया ईश्वर की बनाई सृष्टि के हर अंश की संभाल करना, उन पर दया करना।

दीनता और दृढ-यकिन सच्चे भक्त के गहने :

सांई मस्ताना जी महाराज ने समझाया कि ईश्वर को पाने के लिए उसकी (भगवान) भक्ति – इबादत के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए उस पर दृढ-यकिन होना बहुत जरूरी है। एक भक्त को यकिन होना चाहिए कि भगवान जो करता है, अच्छा करता है और जो करेगा वो भी भले के लिए ही करेगा। मालिक के प्यारे को दीनता- नम्रता को अपना आभूषण बना लेना चाहिए। जिनका आचरण नेक और भावना शुद्ध होती है, मालिक की प्राप्ति उन्हें ही होती है। भक्तों को मालिक के प्यार को पाने के लिए झुके हुए पेड़ों की तरह ही होना चाहिए, जो फल लगते जाने पर झुकते जाते हैं। ऐसे ही भक्तों को प्रेम मार्ग पर चलते हुए दीनता को अपने अंदर समाते जाना चाहिए। वह जीव मालिक पर पूरा विश्वास करे कि ‘मालिक जो करेगा अच्छे के लिए ही करेगा’ और शुक्रगुजार बना रहे। साई जी की इन शिक्षाओं पर चलते हुए ही इन्सान स्वर्ग जैसा जीवन इस धरा पर भोग सकता है और बेशक ईश्वर के अलौकिक नज़ारे भी लूट सकता है।

व्यवहार से सच्चा होना :

ठग्गी, बेइमानी, झूठ और फरेब के इस दौर में साई जी ने लोगों को सिखाया सच के साथ जीना। ईमानदारी को अपनाकर आंतरिक शांति को पाया जा सकता है। मस्ताना जी ने लोगों को साफ़ नीयत रखने और व्यवहार के सच्चे होने का उपदेश दिया। मेहनत की कमाई करके खाने और उसमें से कुछ हिस्सा परहित परमार्थ में लगाने से मनुष्य सुख का जीवन जी सकता है। साई जी का समझाना है कि इससे शायद एकदम तरक्की न भी मिले, पर इन्सान एक दिन तरक्की अवश्य प्राप्त करता है और भयमुक्त होकर अपना जीवन खुशहाली से जी सकता है। यही सब धर्मों का भी कहना है।
साईं मस्ताना जी महाराज की शिक्षाएं जीवों को रूहानियत के मार्ग पर आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक जीवन जीने का सही तरीका दे रहीं हैं और उन जीवों का उद्धार कर रही हैं |

Foundation Day

डेरा सच्चा सौदा का स्थापना दिवस

डेरा सच्चा सौदा – इन्सानियत का द्वार :

डेरा सच्चा सौदा, एक ऐसा रूहानी कॉलेज जहाँ सच का सौदा किया जाता है। यहाँ इन्सान को सच से रू-ब-रू करवाया जाता है और मनुष्य जीवन का असली उद्देश्य बताया जाता है। यहाँ सिखाया जाता है कि मनुष्य जन्म का मकसद प्रभु प्रमात्मा को पाना और इन्सानियत की सेवा करना है।

डेरा सच्चा सौदा एक गैर-सरकारी सामाजिक कल्याण और आध्यात्मिक संस्था है। सावन शाह निरंकारी जी के शिष्य बेपरवाह शाह मस्ताना महाराज ने ‘डेरा सच्चा सौदा’ की स्थापना कर बुराइयों और कुरीतियों से भरे समाज में अलौकिक प्रकाश की लौ जगाई। उन्होंने 29 अप्रैल, 1948 के दिन सिरसा शहर के बेगू मार्ग पर ‘डेरा सच्चा सौदा’ आश्रम की नींव रखी और मानवता का बूटा लगाया | जो आज बढ़ते-बढ़ते विशाल वट वृक्ष बन गया है। आज डेरा सच्चा सौदा के देश-विदेशों में सैंकड़ो आश्रम और हजारों सत्संग घर है, जो लोगों को स्वर्ग जैसी जिंदगी जीना सिखा रहे हैं।

इन्सानियत के जिस बीज को साई मस्ताना जी महाराज ने बोया, उसे दूसरी पातशाही के रूप में शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने हरा-भरा किया। जो आज संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां, डेरा सच्चा सौदा के तीसरे गद्दीनशीनी की पावन रहनुमाई में फल-फूल रहा है और इस समाज को सच का मार्ग दिखा रहा है।

डेरा सच्चा सौदा के कार्य:

सर्वधर्म संगम, यानि एक ऐसी जगह जहाँ सभी समान हो। डेरा सच्चा सौदा कोई विशेष धर्म समर्थक न होकर सभी का सांझा है, जहाँ इन्सान को इन्सान से और इन्सान को भगवान से जोड़ा जाता है। यहां मोक्ष प्राप्ति का सच्चा साधन, ईश्वर प्राप्ति का तरीका – गुरुमंत्र (नाम-शब्द) दिया जाता है, जिसके बदले में कोई दात-चढ़ावा या पैसा नहीं लिया जाता। यहाँ धर्म के नाम पर प्रचलित कर्म-‌कांडों और अंध-विश्वासों से दूर कर सच के मार्ग पर चलाया है, जो इन्सान को केवल सांसारिक खुशियां ही नहीं देता, बल्कि उसके लिए आंतरिक तौर पर भी शांति और परमानंद के भंडार खोल देता है। यहां कभी न खत्म होने वाले आत्मिक सुख को पाने का तरीका देकर उस पर चलना सिखाया जाता है। लोगों को सभी प्रकार की बुराइयों, तकलीफों और नकारात्मकता से दूर कर जीवन जीने का सही तरीका सिखाया जाता है।

डेरा सच्चा सौदा 1948 से ही पर्यावरणवाद, धर्मनिरपेक्षता , मानवतावाद और समाज से नशों को खत्म करने के क्षेत्र में कार्यरत है। यहाँ धर्मों को मानने और इन्सानियत की निस्वार्थ सेवा का पाठ पढ़ाया जाता है। संत एमएसजी जी के मार्गदर्शन में डेरा सच्चा सौदा 156 मानवता भलाई के कार्य कर रहा है, जिसके चलते सैकड़ों विश्व कीर्तिमान हासिल कर डेरा सच्चा सौदा मानवता के नये आयाम स्थापित कर चुका है।

डेरा सच्चा सौदा के नियम :

यहाँ लोगों को सभी सांसारिक बंधनो और मिथ्याओं से दूर कर ईश्वर प्राप्ति के लिए सच्चा नाम-शब्द दिया जाता है, जो जीव को अंदर-बाहर खुशियों से लबरेज कर देता है। डेरा सच्चा सौदा से गुरमंत्र लेने वालों को तीन परहेजों का पालन करना होता है –

 शराब नहीं पीना।
 माँस- अण्डा नहीं खाना ।
 रिश्तों में प्रति वफादार और व्यवहार के सच्चे होना।

यहाँ इन्सान को ‘नाम जपो और प्रेम करो’ का पाठ पढ़ाया जाता है और इन्सानियत की सेवा के लिए प्रेरित किया जाता है। यही इन्सान का धर्म हैं और ईश्वर प्राप्ति का जरिया भी।

डेरा सच्चा सौदा में धर्मों पर चलना सिखाया जाता है, यहाँ नशे और बुराइयाँ छुडवा कर अच्छे कर्मों का ज्ञान करवाया जाता है। सभी भेद-भाव, शुभ-अशुभ या जात-पात को मिटा कर यहाँ सच से अवगत कराया जाता है। दया, दीनता और गुरू पर दृढ-यकीन की शिक्षा दी जाती है।

रूहानियत के 75 वर्ष :

1948 में स्थापित हुए डेरा सच्चा सौदा को 75 वर्ष पूरे हो गए हैं। अब तक साढे ६: करोड़ से ज्यादा लोग बुराइयाँ त्याग डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी बन चुके हैं और पूज्य गुरु जी की शिक्षाओं पर चलते हुए अपने जीवन को सुखमय बना रहे हैं। समाज में रूहानियत का अलौकिक प्रकाश फैलाने वाली इस मशाल की लौ बढ़ती ही जा रही है, जो समाज को नई दिशा दे रही है। डेरा अनुयायी 156 मानवता भलाई के कार्यों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हैं और सामाजिक कल्याण की कड़ी को जोड़ते जा रहे हैं। बेपरवाह मस्ताना जी ने रूहानियत का जो कारवां चलाया, वो दिन-ब-दिन कई गुना बढ़कर सच के मार्ग पर चलता जा रहा है। निस्वार्थ सेवा और मानवता भलाई का ज़ज्बा लिए डेरा और उसके अनुयायी लोक कल्याण में लगे हुए हैं।

इस वर्ष स्थापना दिवस का भंडारा :

हर साल 29 अप्रैल के दिन डेरा सच्चा सौदा के स्थापना दिवस का शुभ भंडारा बहुत ही धूम-धाम से मनाया जाता है। जहां बडी संख्या में अनुयायी इकट्ठे होते हैं और रूहानियत के समुद्र में डुबकी लगाते है। डेरा सच्चा सौदा के शिष्य गुरु की पावन शिक्षाओं पर हुए हर त्योहार या अवसर मानवता की सेवा करते हुए मनाते है | खुशियों और जश्न के माहौल में भी दूसरों का भला करना और माँगना नहीं भूलते | यह विशेष अवसर भी मानवता भलाई के कार्यों के साथ तन-मन-धन इन्सानियत को समर्पित करते हुए बड़ी खुशी, उगंग, मस्ती के साथ मनाया जाता है। गौरतलब है कि इस बार डेरा सौदा को 75 वर्ष पूरे हो रहे हैं, जिस खुशी में लोगों का उत्साह, श्रद्धा का सैलाब और रूहानियत का नया चरम अपने आप में नई रेखाएं खींच रहा है या यूं कहें कि नई दिशा ले रहा है | पवित्र भंडारे का नजारा और आनंद लोगो नई खुशियों से भरने वाला है। आप सभी को डेरा सच्चा सौदा के रुहानी स्थापना माह की हार्दिक शुभकामनाएं।

Eid Mubarak

ईद-उल-फितर-

ईद-उल-फितर या ईद-उल-फित्र खुशी का त्योहार है, जिसे मुख्य रुप से मुस्लिम समुदाय के लोग मनाते हैं। इसे मीठी ईद भी कहा जाता है। यह रमजान के पवित्र महीने के अंत का प्रतीक है। उर्दू कैलेंडर हिजरी संवत चाँद पर आधारित होने के कारण इस त्योहार को चाँद के दीदार से ही मनाया जाता है। रमजान महीने के 30 दिनों के उपवास के बाद शव्वाल महीने के पहले दिन के चाँद को देखकर ही ईद मनाई जाती है। दो प्रकार की ईद : ईद-उल-अजाह और ईद-उल-फितर जिनमें से ईद-उल-फितर को ‘छोटी ईद’ और ईद-उल अजाह को ‘बड़ी ईद’ के से नाम जाना जाता है। लोग इस दिन अल्लाह का आर्शिवाद लेने, शुक्रिया करने और खुशियाँ मनाने के लिए इकट्ठे होते हैं।

ईद पर्व का महत्व :

मुस्लिम समुदाय के लिए धार्मिक इतिहास रखने वाले ‘ईद’ पर्व को आजकल सभी धर्मो के लोग मिलजुल कर मनाते हैं। उर्दू कैलेंडर के नौवे महीने रमज़ान में इस्लामी महजब के लोग पूरे महीने ही उपवास रखते है, जिसे ‘रोज़ा’ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि रोज़ा रखने से अल्लाह प्रसन्न होते हैं, क्योंकि यह उनके धर्म के प्रति समर्पण और त्याग को दर्शाता है। 30 दिनों के उपवास के बाद शव्वाल महीने के पहले दिन चाँद का दीदार किया जाता है। कहा जाता है कि चाँद को देखने से उनके रोज़े पूरे हो जाते हैं, जिससे वे अल्लाह का शुक्रिया अदा करते है कि उसने महीने भर उपवास की ताकत उन्हें दी। रमजान के पवित्र महीने में दान का विशेष महत्त्व है, जिसे ‘ज़कात-अल-फितर’ कहा जाता है। अपनी हक हलाल की नेक कमाई से गरीब समुदाय के लोगों के लिए दान देना इस्लाम धर्म में वाज़िब माना जाता है। जिसमें प्रतिदिन तकरीबन 2 किलो आटा या उसके समतुल्य रक़म गरीबों में बांटी जाती है। चाँद दिखने के अगले दिन ईद का त्योहार बहुत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। सऊदी अरब में चाँद पहले दिन दिखाई देता है और भारत में दूसरे दिन, जिस कारण यह त्योहार तीन दिनों तक चलता है।

इतिहासिक पक्ष :

इस्लाम धर्म में अहम स्थान रखने वाले ‘ईद-उल-फितर’ की विशेष इतिहासिक पृष्ठभूमि है। पहली ईद-उल-फ़ितर सन् 624 ईसवी में मदीना शहर से प्रारंभ हुई। माना जाता है कि पैगंबर हजरत मुहम्मद ने बद्र की लड़ाई में जीत हासिल की थी। जीत के पश्चात् मुहम्मद पैंगबर के मक्का से प्रवास करके पवित्र शहर मदीना पहुंचने पर उत्सव मनाया गया। जीत की खुशी में सबका मुँह मीठा करवाया गया। इसी दिन को ‘मीठी ईद’ या ‘ईद-उल-फ़ितर के रूप में मनाया जाता है। तब से ही ईद-उल-फितर के अवसर पर मुस्लिम समुदाय के लोग रोज़े रखते हैं, कुरान पाठ करके अल्लाह की इबादत करते हैं, जिसका अ्रज या मजदूरी मिलने के दिन को ईद कहा जाता है। यानि महीने भर के उपवास के बाद चाँद के नजर आने पर माना जाता है कि अल्लाह-ताला ने उनके त्याग को कुबूल किया और उन्हें उनकी प्रार्थनाओं का नजराना या मजदूरी आर्शिवाद रूप में अदा कर रहे हो।

कैसे मनाते हैं ईद :

ईद का त्योहार खुशी का त्योहार है, जिसे बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बाजारों में बड़ी रौनक होती है , मस्जिदों मे बहुत बड़ी संख्या में लोग कुरान पाठ यदि नमाज अदा करने पहुँचते हैं। रमज़ान महीने में रोज़े रखने के पश्चात शव्वाल की पहली रात्रि चाँद दीदार किया जाता है। अगले दिन लोग बड़ी खुशी से ईद-उल- फितर मनाते हैं। नए कपड़े पहनते हैं, नमाज़ अदा करते हैं, एक दूसरे को मिलकर ईद’ की ‘मुबारकबाद’ देते हैं। इस दिन लोग एक-दूसरे को नज़रानें भी देते हैं, जिसे ‘ईदी’ कहा जाता है। ज़कात का इस पर्व में अहम हिस्सा है, जिसमें गरीब लोगों को दान दिया जाता है, ताकि वे भी इस उत्सव में शरीक हो सकें और खुशियाँ मना सकें। सेवइयाँ जिसे ‘शीर-कोरमा’ के नाम से जाना जाता है, इस पर्व का मुख्य व्यंजन है। लोग मालिक(भगवान) का शुक्रिया करते हैं और बरकत की अर्ज़ करते हैं, दुआएं मांगते हैं।

संदेश :

ईद-उल-फितर के पर्व को मुस्लिम बिरादरी के लोग बड़े चाव, उत्साह और श्रद्धा-भावना से मनाते हैं, जिसे भाई-चारे और आपसी मेल-मिलाप के प्रतीक पर्व के रूप में देखा जाता है। इस दिन, लोग आपसी नफ़रत और झगडे मिटाकर एक-दूसरे के गले लगते हैं और जश्न मनाते हैं। यह धर्म के प्रति समर्पण , त्याग , आपसी भाई-चारे, दान करने और अल्लाह का शुक्रगुजार बनने का संदेश देता है। यह त्योहार ईमान – मजहब के प्रति वफादार होने, हक-हलाल की नेक कमाई में से कुछ हिस्सा गरीबो में बांटने और आपसी एकता से रहने के लिए प्रेरित करता है।

बैसाखी

बैसाखी पर्व
बैसाखी, जिसे वैसाखी के रूप मे भी जाना जाता है, प्रत्येक वर्ष 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। पारंपरिक तौर पर लोग इसे रबी की फसल पकने की खुशी में नववर्ष की शुरुआत के रूप में मनाते हैं। सिख कैलेंडर के अनुसार यह उनके द्वारा मनाए जाने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है, जिसे विक्रम संवत् के प्रथम गाह में मनाया जाता है। बैसाखी को बंगाल में नवा वर्ष, असम में बिहू, केरल में पूरम विशु के नाम से मनाया जाता है। धार्मिक और फसली महत्त्व रखने वाले इस त्योहार को सिख और हिंदू समुदायों के लोग विशेष उत्साह और खुशी के साथ मनाते हैं।

बैसाखी पर्व का महत्व और इतिहास
इस दिन सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है, जिसे नववर्ष की शुरुआत मानकर किसान खेतों में पक कर तैयार लहलहाती हुई फसलों की कटाई शुरू कर देते हैं। सिखों के सबसे बड़े त्योहारों में से एक बैसाखी, अपने विशेष महत्व के कारण पूरी श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। माना जाता है कि इसी दिन सिक्खों के दसवे और अंतिम गुरु, गुरु गोविंद राय जी का राज्याभिषेक हुआ था। जिन्होंने 13 अप्रैल 1699 को ‘खालसा’ पंथ की स्थापन की। उन्होंने पांच प्यारों को ‘अमृत ‘ छकाया और ‘सिख’ बनाया। तब से ही गुरु गोविंद राय जी गुरु गोबिंद सिंह जी के रूप में पहचाने जाने लगे और सिख धर्म बना। गुरू प्रथा खत्म कर ‘गुरु ग्रंथ साहिब जी को सर्वोच्च माना जाने लगा।
हिंदू समुदाय के लोगों का मानना है कि इसी दिन नदी देवी ‘गंगा’ जी स्वर्ग से पृथ्वी पर आई थी। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन ही ‘जलियाँवाला बाग हत्याकांड’ हुआ था। जब एक शांतिपूर्ण सभा के लिए इकट्ठे हुए लोगों पर अग्रेजी जनरल डायर ने गोलियां चला दी थी। इस हत्याकांड को गहन दर्द के साथ एक त्रासदी के रूप में भी देखा जाता है।

कैसे मनाया जाता है बैसाखी उत्सव
‘अरदास और शुक्र मालिका’ से शुरू होने वाले इस त्योहार को बहुत ही जोश, उमंग और आपसी मेल-मिलाप से मनाया जाता है। सिख लोग गुरुद्वारे जाकर मत्था टेकते हैं, एक-दूसरे को बधाइयाँ देते है और असीम श्रद्धा भावना से इस उत्सव को मनाते है। इस दिन विशेष स्नान का महत्व है। नगर कीर्तन किया जाता है, जिसे बैसाखी का जुलूस भी कहते हैं। अरदास, लंगर, पाठ, कीर्तन और गुरू-प्रसाद के साथ यह त्योहार बहुत ही आनंदमयी तरीके से मनाया जाता है। हिंदू समुदाय के लोग भी विभिन्न नदियों में पवित्र स्नान कर सूर्य देव की पूजा करते हैं। इस दिन दान , पुण्य , नेक कार्यों को विशेष माना जाता है। फसल काटने पर किसान भगवान को समृद्धि और खुशहाली के लिए धन्यवाद देते है और अपनी- अपनी फसल सें कुछ हिस्सा असहाय और गरीब वर्ग के लिए अलग निकाल लेते हैं, जिससे दूसरों की भी मदद हो सके।

बैसाखी पर खास
धार्मिक इतिहास समेटे समृद्धि पर्व और खुशहाली के प्रतीक ‘बैसाखी’ को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन लोग नए कपडे पहनते है, बधाईयाँ देते है, मिठाइयाँ बाँटते हैं और नाचते-गाते हैं। इस दिन कई तरह के पकवान बनाए जाते है। विशेष लंगर लगाए जाते हैं। पंजाब के लोग अपने पारंपरिक परिधान पहनकर भांगडे-गिद्दे करते है।
“पा भंगडा, जट्टा आई बैसाखी”
बैसाखी के पवित्र त्योहार पर हरिद्वार और ऋषिकेश में विशाल मेलों का आयोजन भी किया जाता है।
संदेश
वैसे तो सभी त्योहार अपनी ऐतिहासिक पहचान संजोए होते हैं और अनेक शिक्षाएँ भी देते हैं। बैसाखी पर्व धर्म की मान्यताओं से जुड़ा होने के कारण हमें परमात्मा के प्रति समर्पण, श्रद्धा समुद्र मे डूबने और ‘उसका’ (मालिक का) शुक्रिया करने का संदेश देता है। यह हमें मिल-बाँट कर खाने, भाईचारे, धर्म के प्रति दृढ होने, दान-पुण करने और देश प्रेम के लिए प्रेरित करता है।

Foundation Month

स्थापना दिवस विशेष
स्थापना ‘डेरा सच्चा सौदा ‘ की

” सच्चा सौदा सुख दा राह,
सब बंधनो से पा छुटकारा,
मिलता सुख दा साह”

डेरा सच्चा सौदा
डेरा सच्चा सौदा एक गैर- सरकारी सामाजिक कल्याण और आध्यात्मिक संगठन है, जिसकी स्थापना साई शाह मस्ताना जी महाराज ने 29 अप्रैल, 1948 को सिरसा (भारत) में की। शाह मस्ताना जी सावन शाह जी निरंकारी के शिष्य थे और डेरा सच्चा सौदा की पहली पातशाही बने, जिन्होंने रूहानियत और मानवता के बीज को बोया और मरती हुई इंसानियत को फिर से जिंदा किया |
सच्चा सौदा कोई नया मजहब, धर्म, या कोई लहर नहीं, अपितु ‘सर्वधर्म संगम’ है। जहां सभी धर्मों के लोग एक साथ बैठते हैं। यहाँ इन्सान को सच से जोड़ा जाता और बिना किसी दान-चढ़ावे या पैसा लिये परमात्मा को पाने की विधि (गुरुमंत्र) सिखाई जाती है। वर्तमान में, डेरा सच्चा सौदा के देश-विदेशों में सैकड़ों आश्रम और सत्संग घर है।

डेरा सच्चा सौदा का उद्देश्य-
डेरा सच्चा सौदा की स्थापना साई मस्ताना जी महाराज ने एक ऐसी संस्था के रूप में की जो लोक कल्याण के लिए विभिन्न सराहनीय कार्य करती है। यहाँ आकर लोग हर तरह के पाखंडवाद से दूर होकर सच का ज्ञान प्राप्त करते हैं। जैसे जैसे समय बीतता रहा आगे चलकर यह कारवां डेरा सच्चा सौदा के दूसरे पातशाही ‘शाह सतनाम सिंह जी महाराज’ जी ने आगे बढ़ाया। अपने गुरु साई मस्ताना जी की शिक्षाओं पर चलते हुए उन्होंने लाखों लोगों को ‘गुरुमंत्र प्रदान किया और कुरीतियों को समाज से दूर किया| शाह सतनाम जी ने
हम थे हम हैं, और हम ही रहेंगे।
यह पवित्र वचन फरमाकर पूजनीय शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां अपना उत्तराधिकारी बनाया। जिन्हें लोग ‘MSG’ के नाम से जानते है। डेरा सच्चा सौदा शुरू से ही मानवतावाद, पर्यावरणवाद, धर्मनिरपेक्षता, और समाज से नशों को खत्म करने के क्षेत्र में निरंतर कार्यरत है। संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के मार्गदर्शन में वर्तमान में 156 मानवता भलाई के कार्य किए जा रहे हैं, जिनको देखते हुए अनेकों विश्व कीर्तिमान डेरा सच्चा सौदा के नाम दर्ज हो चुके हैं।

पवित्र वचन और शिक्षाएं :
साई मस्ताना जी ने, 1948 से ही अपने वचनों द्वारा रूहों का उद्धार किया और करते आ रहे हैं। उन्होंने
धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा
का पवित्र नारा दिया, जिसका मतलब है कि हे मालिक ! तू धन्य है और हमें तेरा ही आसरा है। डेरा सच्चा सौदा में रुहानी गुरु से गुरुमंत्र लेने वालों के लिए तीन वचन बताये गये हैं, जिनका पालन पूरी दृढता से करना होता है-
1) शराब नहीं पीना।
2) माँस- अण्डा नहीं खाना।
3) रिश्तों के प्रति वफादार होना।
” किसी पंथ का नाम नहीं,
यह है फुलवारी सब धर्मों की,
छुड़ा कर नशे, मांस, शराब,
यहां बात होती अच्छे कर्मों की,
क्या है सच, क्या है झूठ,
यह फ़र्क बताया जाता,
सच्चे सौदे में 1948 से,
इंसानियत का पाठ पढ़ाया जाता ।”
यहाँ सिखाया जाता है मानवता का भला करना और ‘नाम जपो व प्रेम करो’ का पाठ पढ़ाया जाता है।। शुभ -अशुभ या अंध-विश्वासों से दूर कर यहां इन्सान को सच के मार्ग पर भगवान् से जोड़ा जाता हैं। इन्सान को इंसान से व इन्सान को भगवान् से जोड़ा जाता हैं।

जाम – ए – इन्सां :
समाज मे फैलती धर्मों, जातियों को लेकर भेदभाव व कुरीतियों और नफरतों को खत्म करने और इन्सानियत का संदेश देने के लिए गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी ने शुरू किया जाम-ए-इन्सां गुरु का, जिसकी शुरुआत 29 अप्रैल 2007 को गुरु जी ने स्थापना दिवस के मौके पर मानवता के ‘अमृत’ के रूप में की। जिसे ग्रहण करने से रूहों को पवित्रता और आत्मिक खुशियाँ मिलती है।
” जो इसे श्रद्धा-भावना से पीये,
उसे पहुँचा दे निजधाम,
बिगडे बना दे ये काम, ये है रूहानी जाम “
इस रुहानी जाम को ग्रहण करने वाले 1 (इक्के) का लॉकेट पहनते हैं। जिसका मतलब हम सब एक हैं और हमारा मालिक एक है। हम सब ‘इन्सां ‘ है और ‘इन्सानियत’ ही हमारा धर्म हैं। गुरू जी के वचनानुसार जो जैसी श्रद्धा – भावना रखता है। उसे वैसा असर दिखाई देता है, आत्मिक और बाहरी तौर पर भी।
‘जैसी जिसकी भावना, वैसा ही फल दे।’

डेरा सच्चा सौदा के 75 वर्ष :
जैसा कि अप्रैल 29, 2023 को डेरा सच्चा सौदा की 75वीं वर्षगांठ है, यानि डेरा सच्चा सौदा का 75 वां स्थापना दिवस है, जिसे लगभग 6.5 करोड़ अनुयायी अपने गुरु की पावन शिक्षाओं पर चलते हुए मानवता भलाई के कार्यों के साथ मनाने जा रहे हैं। गौरतलब है कि डेरा के सभी अनुयायी दिन-त्यौहार मनाते हैं पूरी धूम-धाम से, पूरे जोश से, लेकिन साथ ही याद रखते हैं MSG की प्रेरणाओं को। निस्वार्थ भाव से और बिना जान परवाह किये, अपना तन-मन-धन समर्पित कर देते है डेरा द्वारा चलाए जा रहे 156 मानवता भलाई के कार्यों के लिये। इतना ही नहीं, इसी साथ ‘जाम-ए-इन्सां को शुरू हुए हो रहे हैं पूरे 16 वर्ष। इसलिए पूरा अप्रैल माह चलता रहता है भलाई, सेवा, जश्न और रूहानियत का कारवाँ |

Kartik Purnima- Incarnation Day of Shah Mastana Ji Maharaj

इतिहास गवाह है कि जब-जब धरती पर बुराइयों ने जन्म लिया, उन बुराइयों को दूर करने के लिए और मानवता को जिंदा रखने के लिए, तब तब भगवान् स्वयं गुरु, पीर, फकीर के रूप में धरती पर अवतार लेते रहे हैं और ऐसी ही एक आलौकिक ज्योत संवत विक्रमी यानि सन् 1891 में कार्तिक मास की पूर्णिमा के दिन इस पावन धरती पर अवतरित हुई।

गुरू शब्द का अर्थ-

गुरू शब्द दो शब्दों के मेल से बना है। गु+रू, गु का अर्थ होता है अंधकार और रू का मतलब प्रकाश अर्थात जो अज्ञानता रूपी अन्धकार से निकालकर ज्ञान का दीपक जलाएं। एक गुरू मोमबत्ती की तरह होता है जो खुद जलकर दूसरों को प्रकाशित करता है।

कार्तिक पूर्णिमा क्यों स्पेशल है करोड़ों लोगों के लिए-

इस धरती पर जन्म तो अनंत व्यक्ति लेते हैं, लेकिन इतिहास के सुनहरे पन्नों में नाम उनका लिखा जाता है जो अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीते हैं, अपनी सुख-सुविधा का त्याग कर संपूर्ण जीवन मानवता को समर्पित करते हैं। इसी तरह कार्तिक पूर्णिमा के दिन इंसानियत के मसीहा डेरा सच्चा सौदा के संस्थापक बेपरवाह साईं मस्ताना जी महाराज जी ने इस पृथ्वी पर अवतार धारण किया जिन्होंने हजारों लोगों को बुराइयों की दलदल से निकाल, इंसानियत का पाठ पढ़ाते हुए राम-नाम की अनमोल दात देकर मोक्ष का अधिकारी बनाया।

जीवन परिचय –

पूजनीय साईं बेपरवाह मस्ताना जी महाराज का जन्म विक्रमी संवत 1948 (सन् 1891) कार्तिक माह की पूर्णिमा के दिन पूज्य पिता श्री पिल्लामल जी के घर ,गांव – कोटडा, तहसील – गंधेय,जिला कलायत (करात) बिलोचिस्तान (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ। माता जी का नाम पूज्य माता तुलसां बाई जी था। साईं जी का बचपन का नाम खेमामल था। आप जी खत्री वंश से संबंध रखते थे।

आपके बारे में एक उच्च कोटि के फकीर के वचन
आप जी के पूज्य माता-पिता जी के घर 4 लड़कियां ही थी। पुत्र प्राप्ति की इच्छा माता-पिता को सताती रहती थी। 1 दिन उनकी भेंट किसी फकीर से हुई। माता-पिता की सेवा भावना से खुश होकर व सच्ची तड़प देखते हुए फकीर ने वचन फरमाए कि लड़का तो आप के घर जन्म ले लेगा लेकिन वो आपके काम नहीं आएगा यदि यह शर्त मंजूर है तो बताओ यह बात सुनकर माता -पिता जी ने तुरंत कहा कि हमें ऐसा भी मंजूर है। इस प्रकार उस सच्चे फकीर की दुआ से व भगवान की कृपा से पूज्य माता-पिता जी की मनोकामना पूरी हुई और उनके घर शाह मस्ताना जी महाराज के रूप में अलौकिक पुत्र की प्राप्ति हुई।

बचपन में ही ईश्वर के प्रति लगाव व परमार्थी कार्यों में रुचि
बचपन से ही साईं जी को उस मालिक को पाने की तड़प थी और वो पंडित सत्यनारायण जी की पूजा करते थे। एक दिन पंडित जी बोले कि भगवान की भक्ति करने से प्रत्येक मनोकामना पूर्ण होती है जिस से प्रभावित होकर साईं जी ने भगवान सत्यनारायण जी का एक छोटा सा मंदिर बनवाकर उसमें सोने की मूर्ति बनवाकर रख दी। साईं जी एक बार किसी दुकान पर कुछ राशन लेने गए और पहले से वहां कुछ व्यक्ति खड़े थे जो राशन लेना चाहते थे लेकिन पहले उद्धार न चुका पाने की वजह से दुकानदार ने राशन देने से मना कर दिया। साईं जी के पास जो एक रुपया था उससे उन गरीबों को भोजन खिला दिया। लेकिन साईं जी अब सोचने लगे कहीं माता जी नाराज ना हो जाए तो साईं जी ने सारा दिन एक बाग में काम किया और उससे जो भी पैसे कमाए उसका राशन खरीद कर घर ले गए।

सच्चे गुरु से मिलाप
पूज्य साईं मस्ताना जी महाराज ने सच्चे सतगुरु पूर्ण मुर्शिद की तलाश करनी शुरू कर दी।
एक दिन साईं जी मंदिर में बैठकर सत्यनारायण जी की मूर्ति की सेवा कर रहे थे तो अचानक वहां सफेद पोशाक पहने हुए एक फकीर आया। उस फकीर का चेहरा देखकर साईं जी हैरान रह गए, दोनों आपस में प्रभु की भक्ति की बातें करने लगे,इसी दौरान फकीर जी ने बताया कि पूरे गुरु की तलाश करो क्योंकि पूरे गुरु के बिना मोक्ष की प्राप्ति नहीं की जा सकती। उन्होंने बताया कि सत्यनारायण भगवान् को प्रत्यक्ष रुप में देखने के लिए एक पूरे गुरु की तलाश करो, फकीर के लिए साईं जी चाय, पानी लेने गए तो साईं के मन में विचार आया कि कहीं यह फकीर चोर तो नहीं है और सोने की मूर्ति को चुरा न ले, इसी कारण मंदिर का दरवाजा साईं जी ने बाहर से बंद कर दिया परन्तु वापस आने पर सोने की मूर्ति वहीं थी परन्तु फकीर वहां नहीं था। यह देखकर साईं जी हैरान रह गए कि यह फकीर किस उद्देश्य के लिए उनके पास आया है और साईं जी की तड़प सतगुरु के प्रति और बढ़ गई।
साईं जी अपने मुर्शिद को ढूंढते हुए ब्यास पहुंच गए और वहां पहुंचकर उन्होंने सावण शाह महाराज के दर्शन किए और वह उन्हें पहचान गए कि यह वही फकीर है जो उन दिन सत्यनारायण जी के मंदिर में आए थे। साईं जी को सच्चे गुरु की प्राप्ति हो चुकी थी। बाबा सावण सिंह जी महाराज को साईं जी कहने लगे कि आप ही हमें यहां तक लेकर आए हैं, आप हमें अपनी शरण में रखकर नाम की बख़्शीश दीजिए।

नाम की अनमोल दात की प्राप्ति
‌‌ साईं मस्ताना जी महाराज की भक्ति भावना व प्रेम को देखते हुए बाबा सावण सिंह जी महाराज ने साईं जी को नाम की अनमोल दात बख्शीश करते हुए रूहानी वचन फरमाए, “तुझे अपनी दया मेहर देते हैं, जो तेरा सारा काम करेगी तुझे कहीं भी रुकावट नहीं होगी।”

बागड़ का बादशाह व धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा नारा मंजूर
‌‌साईं जी हर समय अपने मुर्शिद का गुणगान करते हुए नाचते-झूमते रहते। उस समय ब्यास में सभी लोग समाधि लगाकर चुपचाप भक्ति किया करते थे लेकिन साईं जी का अंदाज अलग और निराला था। साईं जी जब भी सावण सिंह जी महाराज को देखते तो नाचने झूमने लगते व बोलते “धन धन
सावण शाह तेरा ही आसरा” साईं जी की मस्ती को देखते हुए सावण सिंह महाराज जी ने खुश होकर उन्हें आपने पास बुलाया और कहा भाई यहां सब लोग तो कुछ और नारा बोलते हैं तो‌ साई मस्ताना जी ने नम्रता से कहा कि साईं जी मैंने तो आपको ही देखा है आप ही मेरे भगवान हो आपको देखकर हमारी रूह खिली है इसलिए हम तो ऐसे ही बोलेंगे धन धन सावण शाह तेरा ही आसरा तो सावण सिंह जी ने कहां आप गुणगान तो सतगुरु के गाते हो इसलिए आप
धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा नारा मंजूर किया उस दिन साईं जी का नाम खेमा मल से मस्ताना हो गया और बाबा सावण सिंह जी ने वचन फरमाए *जा मस्ताना हम तुम्हें बागड़ का बादशाह बनाते हैं और वहां जाकर रुहों का उद्धार करना और बख़्शीश प्रदान की।

उत्तराधिकारी की घोषणा
‌ पूजनीय बेपरवाह साईं मस्ताना जी महाराज डेरा सच्चा सौदा की पहली पातशाही थे। 12 वर्ष तक साईं जी ने सतगुरु के रूप में सेवा की। सन 1960 में साई जी ने परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को डेरा सच्चा सौदा का वारिस बनाया व ज्योति ज्योत समा गए।
‌ साईं मस्ताना जी महाराज ऐसी महान शख्सियत थे जिनकी महिमा को बयान करना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है, उनकी महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। साईं जी ने जो बाग लगाया आज वह इतना फल फूल चुका है कि आज 6 करोड़ से भी ज्यादा लोग इस बाग़ का हिस्सा बन चुके हैं जो नशे का त्याग कर आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं व मानवता के सच्चे पहरी है और मानवता भलाई के कार्य करने के लिए 24*7 तैयार रहते हैं।

मानवता भलाई के कार्य करके पूरे माह को मनाना
जहां आज लोग प्रत्येक त्योहार बहुत सारे पैसे खर्च करके मनाते हैं तो दूसरी ओर, संत डॉ गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के मार्गदर्शन से अनुयाई इस दिन को ही नहीं बल्कि पूरे माह को मानवता भलाई के कार्य करके जरूरतमंद लोगों की जरूरतों को पूरा करके मना रहे हैं ताकि बेसहारों का सहारा बना जा सके।
आइए हम सब भी प्रण लें कि प्रत्येक त्योहार फजूल खर्च न करके बल्कि उस पैसे को जरूरतमंद लोगों की जरूरतों को पूरा करके मनाएं।

Happy Eid-Ul-Fitr 2022- How Eid is celebrated?

हमारे देश में बहुत से त्यौहार मनाए जाते हैं और प्रत्येक जाति व संप्रदाय के लिए अलग-अलग त्यौहार अलग-अलग महत्व रखते हैं। इन्हीं त्यौहारों में से एक है ईद का पर्व। जोकि इस्लाम धर्म के लिए खुशियों का त्यौहार है। लेकिन बदलते समय के अनुसार सभी धर्मों के लोग इस त्यौहार को मिलकर मनाते हैं। रमजान के पाक महीने में मुस्लमानों का रोजा रखना आवश्यक है क्योंकि वह मानते हैं कि ऐसा करने से अल्लाह प्रसन्न होते हैं। यह त्यौहार हमें सिखाते हैं कि कैसे हम इंसानियत की सेवा कर सकते हैं, जिससे एक स्वस्थ व बेहतर समाज का निर्माण हो सकता है।

शुरूआत

यह मान्यता है कि बद्र की लड़ाई में पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने जीत हासिल की। जिसकी खुशी में सबका मुंह मीठा करवाया गया, तब से इसी दिन को ईद-उल-फितर या मीठी ईद के रूप में मनाया जाने लगा।

इतिहास

मुसलमानों द्वारा मनाए जाने वाला ईद का त्यौहार जोकि रमज़ान का चांद के डूबने से लेकर ईद का चांद नजर आने पर उसकी अगले दिन की पहली तारीख को मनाया जाता है। इस्लाम धर्म में दो ईदें मनाई जाती है – पहली ईद -624 ई. उल-फि़तर पैगम्बर मुहम्मद ने जंग-ए-बदर के बाद मनायी और दूसरी ओर ईद उल जुहा व बकरीद कहलाती है। पूरे महीने अल्लाह के बंदे ईद उल फितर के अवसर पर अल्लाह की इबादत करने के साथ-साथ रोजा रखते हैं। क़ुआन करीम कुरान की तिलावत करके अपनी आत्मा का शुद्धीकरण करते हैं। इस उत्सव को पूरी दुनिया भर के मुसलमान बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाकर अपना मनोरंजन करते हैं।

कैसे मनाएं ईद के त्यौहार को?

जैसा की आप सभी जानते है, बहुत से लोग प्रत्येक त्यौहार बहुत सारे पैसे खर्च करके मनाते हैं। आइए हम सब भी ईद के त्यौहार को इस अनोखे ढंग से मनाएं कि गरीब लोग भी नए कपड़े पहनकर ईद के त्यौहार को मनाने के साथ-साथ वह भी खुशियों को एक दूसरे के साथ बांट सकें।

कैसे मनाते हैं लोग यह त्यौहार?
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ईद का त्यौहार आपसी मेल मिलाप व भाईचारे का त्यौहार है, ईद के अवसर पर लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं। जिस से आपसी प्यार बढ़ता है और जिससे नफरत दूर हों जाती है।

प्रभु का शुक्राना करना-

उपवास की समाप्ति पर लोग अल्लाह का शुक्राना अदा करते हैं कि ईद में उन्हें महीने भर में उपवास रखने की शक्ति दी। ईद के अवसर पर नए कपड़े, अच्छा पकवान बनाएं जाते हैं और साथ ही दोस्तों को तोहफे बांटे जाते हैं।

ईद के दिन मस्जिदों में भीड़-

ईद के दिन मस्जिदों में सुबह की प्रार्थना करने से पहले प्रत्येक मुसलमान को दान या भिक्षा देनी होती है। जिसे ज़कात उल-फ़ितर कहते हैं यह दान कोई भी खाने की चीजें हो सकती है जैसे कि आटा व अन्य कोई भी वस्तु जिसको गरीबों में बांटा जाता है।

उपसंहार-

आइए हम सब भी गरीब लोगों के साथ मिलकर इस त्यौहार को मनाएं और अपनी खुशियों को दोगुना करें।

New year special: Best ways to welcome 2022

नया साल नई उम्मीदों के साथ-

जब भी कोई त्योहार आता है, तो सभी के मन मे नई उम्मीदें, नए सपने होते है। हर किसी को उस त्योहार का बेसब्री से इंतजार रहता है। अब नए साल 2022 का बस कुछ ही पलों में शुभारंभ होने वाला है और सभी की ये चाहत होती है कि नए साल की शुरुआत नई उम्मीदें और संकल्पों के साथ हो। हर कोई चाहता है कि अपने जीवन के बुरे अनुभवों और पलों को भुलाकर नई उमंगों के साथ आगे बढ़ा जाए।

कैसे मनाएं नया साल का जश्न-

जैसे ही नए साल में एक दिन बाकी रह जाता है, तो सभी लोग इसका स्वागत करने के लिए उत्साहित नजर आते है। विश्व भर में नए साल का जश्न मनाया जाता है। 31 दिसंबर को रात को लोग 12 बजने का इंतजार करते है। 12 बजते ही सभी लोग एक-दूसरे को नए साल की शुभकामनाएं देते है। जैसे कि कोरोना काल के चलते अगर आप अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से नहीं मिल सकते, तो ऐसे में आप न्यू ईयर ग्रिटिंग व व्हाट्सएप मैसेज के जरिए शुभकामनाएं भेजे। कोरोना की नई लहर ‘ओमिक्रोन’ के चलते सरकारी दिशा निर्देशों का पालन करते हुए ही नया साल मनाए।

नया साल मनाने का सबसे अच्छा तरीका-

खुशियां बांटने से बढ़ती है। अगर हम अपना कोई भी त्योहार जरुरतमंदो के साथ मनाए तो वो हमें दिल से दुआएं देते हैं। हमें अति जरूरतमंद लोग को व अनाथ बच्चों को खाना, खिलौने और अन्य आवश्यक सामान वितरित करते नए साल के पवित्र त्योहार को मनाना चाहिए। आइए हम सब प्रण करें कि अपना प्रत्येक त्यौहार जरूरतमंद लोगों की जरूरतों को पूरा करके मनाएं और वास्तव में सच्ची खुशी प्राप्त करे, इन सर्दी के दिनों में अति जरूरतमंदों का सहारा बनें उन्हें गर्म कपड़े, कंबल व खाना बांट कर नया साल मनाए। ऐसा करने से आप प्रभु की कृपा दृष्टि के पात्र अवश्य बन जाते है।

1.नया साल हमारे लिए जीवन में कुछ नया करने का मौका देता है, क्योंकि जिंदगी में जो बीत चुका है, उससे शिक्षा लेकर हम आगे बढ़ सकते हैं।

  1. पुराने साल का बीतना और नए साल का आना हमें सिखाता है कि कैसे हम संघर्ष करके दुःख से दूर होकर सुख प्राप्त कर सकते हैं।

3.नया साल हमें सिखाता है कि कैसे हम अपने जीवन में सफलता प्राप्त करके अभाग्यशाली से भाग्यशाली बन सकते हैं।

निष्कर्ष
आइए हम सब भी प्रत्येक त्योहार ज़रूरतमंद लोगों के साथ मनाए फ़िज़ूल खर्ची से बचें और उन पैसों से ही जरूरतमंद लोगों की जरूरतों को पूरा करके उनके चेहरों पर खुशी प्राप्त करके नए साल की शुरुआत करें। नए साल की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। हमारी यही कामना है कि नया साल सभी के लिए खुशियां लेकर आए और सब के आंगन खुशियों से महक उठे।

Merry Christmas 2021- know it’s history and facts

क्रिसमस ईसाई धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला विश्व का सबसे लोकप्रिय त्यौहार है। जोकि हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाता है। परन्तु आज यह त्यौहार प्रत्येक जाति और धर्म में लोकप्रियता हासिल कर चुका है और लोग इस से ज्यादा जुड़ने लगे हैं।

किन शब्दों के मेल से बना है-

क्रिसमस शब्द दो शब्दों के मेल से बना है ‘क्राइस्ट्स और मास’ जोकि पुरानी अंग्रेजी के शब्द क्रिस्टेमैसे और क्रिस्टेसमैसे शब्द से नकल किया गया है और फिर 1038 ई. से ही इसको क्रिसमस कहा जाता है। क्रिस का अर्थ होता है ईसा मसीह और मस का अर्थ होता है ईसाइयों का प्रारथनामय समूह व मास।

भारत में क्रिसमस-

भारत में ईसाई लोग ढा़ई फीसदी रहते हैं, फिर भी इस त्यौहार को धूमधाम व उत्साह के साथ मनाया जाता है। गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जिसमें क्रिसमस बड़े ही जोश व उत्साह के साथ मनाया जाता है। इन चर्चों में अधिकांश चर्च भारत में ब्रिटिश और पुर्तगाली शाहू के दौरान स्थापित किए गए थे।

क्रिसमस से जुड़ी परंपराएं जो इनको बनाती है खास-

संता निकोलस-

इनका जन्म ईसा मसीह की मृत्यु के लगभग 280 साल बाद मायरा में हुआ। उन्होंने अपना पूरा जीवन यीशू को समर्पित किया था और वह लोगों की मदद किया करते थे। यही वजह है कि वह यीशु के जन्मदिन के मौके पर रात के अंधेरे में बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे। इस वजह से बच्चे आज भी अपने संता का इंतजार करते है।

सेंटा क्लॉज-

बच्चे क्रिसमस के मौके पर सैंटा क्लॉस का इंतजार करते हैं, क्योंकि सेंटा बच्चों को गिफ्ट देता है।

क्रिसमस के 12 दिन-

पहला दिन -25 दिसंबर
इस दिन से ही क्रिसमस का जश्न शुरू हो जाता है। ये दिन ईसाई प्रभु ईसा मसीह के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है।

दूसरा दिन-
26 दिसंबर को ईसाई धर्म के लिए अपनी कुर्बानी देने वाले सेंट स्टीफन के नाम से सेंट स्टीफन डे मनाया जाता है।

तीसरा दिन- 27 दिसंबर
ये दिन ईसा मसीह के मित्र सेंट जाॅन को समर्पित होता है।

चौथा दिन- 28 दिसंबर
किंग हीरोद ने ईसा मसीह को ढूंढते समय कई मासूम लोगों को कत्ल कर दिया। उन मासूम लोगों की याद में ये दिन मनाया जाता है।

पाॅचवां दिन- 29 दिसंबर
12वीं सदी में चर्च पर राजा के अधिकार को चुनौती देने पर संत थाॅमस को कत्ल कर दिया गया था। ये दिन उनको समर्पित है।

छठा दिन- 30 दिसंबर
ईसाई धर्म को मानने वाले लोगों द्वारा इस दिन सेंट ईगविन ऑफ वर्सेस्टर को याद किया जाता है।

सातवां दिन- 31 दिसंबर
पोप सिलवेस्टर द्वारा इस दिन को मनाया गया। इस दिन को नए साल की शाम के रूप में मनाया जाता है और खेलों का आयोजन किया जाता है।

आठवां दिन – 1 जनवरी
यह दिन ईसा मसीह की मां मदर मैरी को समर्पित है।

नौवां दिन- 2 जनवरी
चौथी सदी के सबसे पहले ईसाई ‘सेंट बसिल द ग्रेट’ और ‘सेंट ग्रेगरी नाजियाजेन’ को याद किया जाता है।

दसवां दिन- 3 जनवरी
इस दिन चर्च को बहुत अच्छे ढंग से सजाया जाता है और गीत भी गाए जाते है क्योंकि इस दिन ईसा मसीह का नाम रखा गया था।

ग्यारहवां दिन – 4 जनवरी
18वीं और 19वीं सदी के सेंट एलिजाबेथ को इस दिन याद किया जाता है।

बाहरवा़ं दिन- 5 जनवरी
यह दिन क्रिसमस पर्व का आखरी दिन होता है। जो अमेरिका के पहले बिशप सेंट जाॅन न्यूमन को समर्पित है।

क्रिसमस ट्री का महत्व-

कहा जाता है यीसू के जन्म के मौके समय एक फर के पेड़ को सजाया गया था। जिसको बाद में क्रिसमस ट्री कहा जाने लगा। क्रिसमस ट्री को अच्छे से सजाया जाता है जो फर का वृक्ष होता है चीनी और हिबूर लोगों ने सबसे पहले इस परंपरा की शुरुआत की। उनका विश्वास था कि इस पौधे को घरों में सजाने से घर में नकारात्मक शक्तियां दूर होती है।

कोरोना महामारी के चलते सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए ही आप चर्च घरों में जाएं क्योंकि आपकी सुरक्षा आपके हाथों में ही है।

सभी को क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएं और सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए ही इसे मनाया जाए।

इस त्यौहार को मनाने का संदेश-

क्रिसमस के त्यौहार को मनाना शांति और सद्भावना का प्रतीक माना है। बाइबल में यीशु को भी शांति का दूत बताया गया है। क्योंकि क्रिसमस शांति का संदेश देता हैं। शांति के बिना किसी भी धर्म का अस्तित्व संभव नहीं है। इसलिए किसी भी धर्म में हिंसा, संघर्ष एवं युद्ध आदि का कोई स्थान नहीं है।

30th Yaad-E-Murshid Free Eye Camp

30वां याद-ए-मुर्शिद नि:शुल्क नेत्र शिविर

डेरा सच्चा सौदा की दूसरी पातशाही परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की याद में 30वां “याद-ए-मुर्शिद” परमपिता शाह सतनाम जी महाराज फ्री आई कैंप प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी 12 से 15 दिसंबर तक आयोजित किया जा रहा है जो पूर्ण रूप से नि: शूल्क है। अगर आपके आस-पास कोई जरूरतमंद व्यक्ति है, तो उसे इस शिविर में जरुर लेकर आए व इस कैंप से लाभ उठाएं जी।

नि:शुल्क नेत्र जांच व ऑपरेशन-

संत डॉ गुरमीत राम रहीम सिंह जी की पावन प्रेरणा से राष्ट्रीय अंधता नियंत्रण कार्यक्रम के तहत
आर्थिक स्थिति कमजोर होने व आँखों की बीमारियों से छुटकारा दिलवाने के लिए शाह सतनाम जी धाम में 12 दिसंबर से ही फ्री जांच, चश्में व दवाइयां देने के साथ-साथ चयनित मरीजों के लैंस वाले ऑपरेशन भी शाह सतनाम जी स्पेशलिस्ट हस्पताल के अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर में नि:शुल्क किए जाएंगे।

कैंप की पर्चियां-

शाह सतनाम जी धाम में स्थित डिस्पेंसरी में 10 दिसंबर से ही कैंप की पर्चियां बननी शुरू हो गई और वही विशेषज्ञ चिकित्सकों द्वारा मरीजों की जांच शाह सतनाम जी धाम में स्थित शेड के नीचे 12 दिसंबर से शुरू की हो गई है।

कैंप का समय-

कैंप का समय सुबह 9 बजे से लेकर शाम 4 बजे तक होगा जी।

सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन-

कोरोना की बीमारी से बचने के लिए सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए ही इस कैंप में आना है जी। आपस में छह फीट की दूरी, थ्री लेयर मास्क पहनना और हाथों को बार-बार साबुन या सेनेटाइजर से साफ करना, छींकते या खांसते वक्त मुंह व नाक को अच्छी तरह ढक कर रखे जी।

इस कैंप में कौन-कौन न आएं जी-

65 वर्ष से अधिक उम्र वाले,
गर्भवती महिलाएं, बच्चे व जिस को कोरोना के लक्षण जैसे कि खांसी, जुकाम, गले में दर्द या बुखार हो तो वो इस कैंप में ना आएं जी।

मरीज अपने साथ क्या-क्या लेकर आए-

मरीज अपने साथ दो आईडी प्रूफ जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड या वोटर कार्ड लेकर आए व साथ में एक वारिस भी लेकर आएं। मरीजों व वारिस के खाने-पीने व रहने का प्रबंध आश्रम की तरफ से नि:शुल्क किया जाएगा।

  • डाॅक्टर द्वारा बताए गए परहेज व हिदायतों का अच्छी तरह से पालन करते हुए सभी ने इस कैंप का लाभ उठाना है जी। आगे से आगे बताएं-

यदि आप के आस-पास भी कोई जरूरतमंद व्यक्ति हैं, जिसे आँखों की कोई भी समस्या है। तो वो भी इस आई फ्री कैंप से लाभ उठा सकता है। इसलिए आगे से आगे बताएं ताकि कोई भी व्यक्ति आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण इस कैंप से वंचित ना रह जाए।

फ्री नेत्र जांच शिविर संबंधी किसी भी प्रकार की अन्य जानकारी के लिए 70820-77641, 70820-77697 पर संपर्क कर सकते हैं जी।

हर वर्ष डेरा सच्चा सौदा में इस शिविर के दौरान बहुत से मरीजों की जांच व ऑपरेशन फ्री में करवाएं जाते हैं। इसलिए आप भी इस कैंप से लाभ उठाएं जी।

Consolidated Report for registration-
(Male Wing)

10.12.21 = 341
11.12.21 = 551
12.12.21 = 526
13.12.21 = 407

Total till date is – 1825 in Male wing Department.

Consolidated Report for registration-
(Female Wing)

10.12.21 = 341
11.12.21 = 551
12.12.21 = 585
13.12.21 = 749

Total till date is – 2226 in Female wing Department.

Total registration till date for both the department-

MALE- 1825
FEMALE- 2226

Registration for both sides – 4051

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